बालक - बालिकाओं के विकासात्मक चरण / क्षेत्र
विकास के क्षेत्र
शारीरिक विकास— इससे आशय शरीर के आकार एवं शरीर के अनुपात में विकासात्मक परिवर्तन से है जिसका मापन लंबाई एवं भार से होता है। शारीरिक विकास के अंतर्गत आस्तियों की वृद्धि, वसा, मांसपेशियों, दांत यौवनारंभ काल में परिवर्तन की प्रमुख एवं गौण विशेषताएं एवं स्नायु तंत्र संबंधी विकास आते हैं।
गामक विकास — गामक विकास में विलंब होने या अविकसित रहने की दशा में बच्चे का दूसरे क्षेत्र में भी विकास प्रभावित होता है। गामक विकास बौद्धिक स्तर, भ्रूण की गतिविधियों, पौष्टिक भोजन, प्रसव पीड़ा, पूर्व परिपक्व जन्म, माता—पिता द्वारा अति संरक्षण गामक विकास की गति को प्रभावित कर सकती है।
गामक विकास की श्रेणी
| सामाजिक मस्कुराहट | 1—3 माह |
| चूसना | 1 माह |
| सिर ऊपर उठाना ( अधोमुख की स्थितियां ) | 1 माह |
| बैठने की स्थिति | 4 माह |
| पूर्ण रूप से ( आगे - पीछे ) मुड़ना | 6 माह |
| बैठना सहारे के साथ बैठना | 5 माह |
| बिना सहारे के बैठना | 9 माह |
| मूत्रालय नियंत्रण | 2 से 4 वर्ष |
| आंत नियंत्रण ( शौच पर नियंत्रण ) | 2 वर्ष |
| पकड़ना | 4 माह |
| पकड़ना एवं जकड़ना | 5 माह |
| सहारे से खड़े होना | 8 माह |
| बिना सहारे के खड़े होना | 11 माह |
| सहारे से घूमना | 11 माह |
| बिना सहारे घूमना | 12 माह |
भाषा विकास—
भाषा संप्रेषण का सशक्त माध्यम है।
वाणी/वाचा भाषा का केवल एक रूप है।
वाणी / वाचा भाषा सीखने से शब्दावली का निर्माण, शब्दों का उच्चारण, शब्दों को व्याकरण की दृष्टि से सही वाक्य बनाना आदि में निपुणता आती है।
वाणी से पूर्व बालक को चार रूप सीखने होते हैं।
(अ) रोना (ब) संकेत (स) तुतलाना (कूंजन क्रिया से बतावें) (द) संवेगात्मक अभिव्यक्तियां
भाषा विकास के चरण —
बालक एवं वयस्क की भाषा में अंतर व्याकरण की अपेक्षा शैली में ज्यादा होता है।
वाणी दोष :— तुतलाता, हकलाना एवं अस्पष्ट उच्चारण।
संज्ञानात्मक विकास - व्यक्तियों के संज्ञानात्मक विकास के सामान्य स्तर का एकमात्र और सार्वभौमिक मापक बुद्धि कहलाती है। मस्तिष्क में तन्त्रिका प्रारूप बौद्धिक विकास को निर्धारित करता है। संज्ञानात्मक विकास निम्नानुसार होता है-
(अ) संवेदीय गामक अवस्था (0-2 वर्ष तक) - शैशवावस्था मे संज्ञान संवेदनाओं और गामक क्रियाओं पर आधारित होता है न कि चिन्तन पर ।
(ब) पूर्व संक्रियात्मक अवस्था (2 से 7 वर्ष तक)-इस अवस्था में बच्चे आत्म केन्द्रित होते हैं। इस अवस्था में प्रतीको एवं भाषा का व्यापक रूप से प्रयोग करते है।
(स) मूर्त संक्रियात्मक अवस्था (7 से 11 वर्ष तक)-इस काल में बच्चा मूर्त (वास्तविक) तथा प्रत्यक्षणीय घटनाओं पर संक्रिया करता है। तार्किक नियम समझ पाता है।
(द) औपचारिक संक्रियात्मक अवस्था 11 से 15 वर्ष )-यह बौद्धिक विकास की शीर्ष अवस्था है। बच्चा अमूर्त चिन्तन, निदानात्मक तर्क एवं प्रत्यय को समझ सकता है। चिन्तन प्रकिया एक औपचारिक तर्कसंगत, सुव्यस्थित एवं प्रतीकात्मक प्रकार की होती है।
संवेगात्मक विकास - इसमें बच्चे का व्यवहारिक परिवर्तन व चेतना समाहित होती है। संवेगात्मक अवस्था एक जटिल प्रकिया है। इसमें एक उच्च स्तर की क्रियाशीलता एवं सशक्त भावनाएं जुड़ी रहती हैं।
परिपक्वता- सीखने का स्तर व अवसर में भिन्नता के कारण वैयक्तिक भेद सामान्य होते हैं।
| प्रसन्नता | 6 —8 सप्ताह |
| गुस्सा | 3—4 सप्ताह |
| दुःख , भय | 8—9 सप्ताह |
| स्नेह / वात्सल्य / शरमाना | 10—12 सप्ताह |
| गर्व | 12—24 सप्ताह |
| दोषी भावना, ईर्ष्या | 3—4 सप्ताह |
| नम्रता, विश्वास, असुरक्षा | 4—6 सप्ताह |
सामाजिक विकास —
(अ) सामाजिक अपेक्षाओं के अनुरूप व्यवहार करने की योग्यता ही सामाजिक योग्यता और सामाजिक विकास कहलाता है।
(ब) किसी संस्कति, परिवेश आयु, लिंग एवं सामाजिक मापदण्डानुसार स्थापित नियमों का पालन सामाजिक विकास का द्योतक है ।
० खेल विकास - वह क्रिया जो बिना अंतिम परिणाम क विचार के की जाती है और जो केवल मनोरंजन करती है, खेल कहलाती है।
जीवन के प्रथम तीन वर्ष (खेल विकास)
1.. पूर्व सांकेतिक खेल -
2. सांकेतिक खेल का आविर्भाव —
सांकेतिक खेल, सांकेतिक, प्रतिनिधित्व, बनावटी भाव भंगिमाएं : 12 से 18 के मध्य
3. सांकेतिक खेल विस्तारण — 18 से 42 माह के मध्य


